बाब चहारुम

क़ुरआन के वो हिस्से जो बरवक़्त हाजत वज़ाअ किए गए

हमें यक़ीन-ए-कामिल है कि अगर निहायत ग़ौरो-फ़िक्र और बे-तास्सुबी से क़ुरआन का मुताअला किया जाये तो इस अम्र में किसी किस्म के शक व शुबह की गुंजाइश नहीं रहती कि क़ुरआन के बहुत से हिस्से हज़रत मुहम्मद ने हसब-ए-ज़रूरत अपनी मतलब-बरारी के लिए वज़ाअ कर लिए थे। ये बड़ा भारी इल्ज़ाम है लेकिन हम उस की हक़ीक़त को अभी साबित करेंगे । इस मुक़ाम पर ये ख़ूब याद रखना चाहिए कि आँहज़रत की अमली ज़िंदगी की तफ़हीम-तामा के लिए अज़बस ज़रूरी है कि क़ुरआन के जिन हिसस से आपके हालात-ए-ज़िंदगी ताल्लुक़ रखते हैं उन के साथ उनका ख़ूब अच्छी तरह से मुक़ाबला किया जाये । इस मुक़ाबला से ये अम्र भी बख़ूबी मुनकशिफ़ हो जाता है कि क़ुरआन ने किस तरह बतदरीज तरक़्क़ी की और वही आस्मानी ने किस ख़ूबी और ख़ुश उसलूबी के साथ मौजूदा हालात ज़माना से नज़ाबक़ खाकर आँहज़रत के अक़्वाल व अफ़आल मतनाक़ज़ा को इज़्न-ए-ईलाही की सनदात व मवाहीर के साथ पेश किया क्योंकि सिर्फ ये एक वसीला था जिससे आँहज़रत की मुतबद्दल हिक्मत-ए-अमली पर हर्फ़ ना आता और ख़ुद बदौलत भी कोली व फ़अली तबाइन व मग़ाइरत के इल्ज़ाम से बरी ठहरते। सिर्फ इसी किस्म के मुताअला के ज़रीया से ये मसाइल और तब्दलात समझ में आ सकते हैं कि ये यरूशलेम की जगह मक्का क्यों क़िब्ला मुक़र्रर किया गया और ला इकराअह फ़ीद्दीन (لا اکراہ فی الدین) (दीन में ज़बरदस्ती नहीं है) की जगह واقتلو ھم حیث ثقفتموھم ‎ और क़तल करो उन को जहां कहीं पाओ क्यों फ़र्मा दिया ? और इलावा-बरीं आँहज़रत के ख़ानगी उमूर के बारे में बहुत से मुतज़ाद व मतनक़ीज़ अहकाम हैं। बड़े बड़े मुसलमान मुफ़स्सिरीन मसलन इब्न हिशाम, तिबरी, यहया और जलाल-उद्दीन वग़ैरा की ये शहादत है कि एक मर्तबा आँहज़रत पर ये बुरी ख़्वाहिश ग़ालिब आई कि ख़ुद ही एक इल्हाम या वही का बयान घड़ कर क़ुरैश को सुना दें और आप ने ऐसा ही किया। चुनांचे यूं मर्क़ूम है :—

एक रोज़ आँहज़रत हरम-ए-काअबा में दाख़िल हुए और सूरह अल-नजम पढ़ कर सुनाने लगे। क़ुरैश की देरीना मुतवातिर मुख़ालिफ़त से आप पस्त-हिम्मत हो गए और आप के दिल में बड़ी ज़बरदस्त ख़्वाहिश पैदा हुई कि किसी तरह से उन लोगों से सुलह हो जावे । ये मुख़ालिफ़ों को दोस्त बनाने की ख़्वाहिश इतनी ज़बरदस्त हुई कि आप मग़्लूब हो गए। चुनांचे जब इस आयत पर पहुंचे । जिसमें लात व उज्जा व मनात तीन बुतों का ज़िक्र है तो आप ने क़ुरैश को ख़ुश करने की ग़रज़ से ये जुमला ज़ाइद पढ़ दिया। ये बुज़ुर्ग देवियाँ हैं जिनसे शफ़ाअत की उम्मीद की जा सकती है, इस से क़ुरैशी बहुत ख़ुश हो गए और यह कहते हुए आपके साथ इबादत करने लगे कि, अब हमने जाना कि सिर्फ ख़ुदा ही है जो मुही व ममीत और ख़ालिक़ व राज़ीक़ है और यह हमारी देवियाँ सिर्फ उस के हुज़ूर में हमारी सिफ़ारिश व शफ़ाअत करती हैं। और जब तूने उन के लिए ये रुत्बा मुक़र्रर कर दिया है तो हम तेरी पैरवी करने पर राज़ी हैं।

लेकिन आँहज़रत ने बहुत जल्द अपनी इस कोताह-अंदेशी की सुलह से पीशमान हो कर अपने वो  अल्फ़ाज़ जो इन बुतों की तारीफ़ में इस्तिमाल किए थे। वापिस ले लिए और उन के इव्ज़ में जे़ल की इबारत जैसी अब मौजूदा क़ुरआन में पाई जाती है पढ़ सुनाई :—

أَلَكُمُ الذَّكَرُ وَلَهُ الأُنثَى تِلْكَ إِذًا قِسْمَةٌ ضِيزَى إِنْ هِيَ إِلاَّ أَسْمَاء سَمَّيْتُمُوهَا أَنتُمْ وَآبَاؤُكُم

सूरह अल-नजम 21 से 23 वीं आयत तक :—

क्या तुम्हारे बेटे और उस के लिए बेटियां? ये तो बहुत बेढंगी तक़्सीम है। ये सब नाम हैं जो तुम्हारे बाप दादों ने रख लिए हैं I

फिर अपनी इस ग़लती पर पर्दा डालने के लिए आपने एक और इल्हाम घड़ा जिसकी रु से गोया खुदा आपसे कहता है कि :—

ए मुहम्मद ख़ातिरजमा रख तेरा हाल अच्छा है। तुझसे पहले नबी भी इसी तरह आज़माऐ गए। शैतान ने इन को भी ऐसी तर्ग़ीबें दें। इस तमाम ग़लती का बानी शैतान है। चुनांचे सूरह अल-हज्ज में यूं मर्क़ूम है :—

وَمَا أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ مِن رَّسُولٍ وَلا نَبِيٍّ إِلاَّ إِذَا تَمَنَّى أَلْقَى الشَّيْطَانُ فِي أُمْنِيَّتِهِ فَيَنسَخُ اللَّهُ مَا يُلْقِي الشَّيْطَانُ

और जो रसूल या नबी हमने तुझसे पहले भेजा। जब ख़्याल बाँधने लगा शैतान ने कुछ मिला दिया उस के ख़्याल में। पस अल्लाह मंसूख़ करता है जो कुछ शैतान ने मिला दिया I

ये मुंदरजा-बाला वाक़िया ऐसा है और इस पर ऐसे शवाहिद मौजूद हैं कि इस से इन्कार नामुम्किन है। जब आँहज़रत इब्तिदा ही में ऐसी आरज़ू के सामने मग़्लूब हो गए और हसब-ए-मर्ज़ी और हसब-ए-मौक़ा वही आस्मानी घड़ लिया तो बाद में जब दुनियावी शानो-शौकत का दरिया मोजज़िन था और ऐसी आरज़ूओं के ग़लबा का ज़्यादा मौक़ा था क्या ताज्जुब कि आपने इसी तरह इफ़्तिरा व इख़तराअ से बार-बार काम लिया हो। मज़कूरा-बाला वाक़िये का बयान हम मुआलिम से नक़ल करते हैं :—

قال ابن عباس ومحمد ابن کعب القرظی وغیر ھمامن المفسرین لمارا ی رسول اللہ تولی قومہ عنہ ومشق علیہ مارای من مباحد تھمہ عما جاء ھم بہ من اللہ تمنی فی نفسہ ان یاتیہ عن اللہ مایقارب بینہ وبین قومہ یحرصہ علی ایمانھمہ فکان یوم فی مجلس قریش فانزل اللہ تعالیٰ سورہ النجم فقرا ھار سول اللہ وحتی بلغ قولہ افراتیم اللات والعزی ومناتہ الثالثتہ الاخری القیٰ الشیطان علی لسانہ بما کان یحدث بہ نفسہ ویتمنا ہ تلک الغرانیق العلیٰ  وان شفا عتھم لترتجی فلما سمعت  قریش ذلک فرحوبہ

इब्न अब्बास और मुहम्मद इब्न काअब अलक़रज़ी वग़ैरा मुफ़स्सिरीन ने बयान किया है कि जब रसूलअल्लाह ने देखा कि इस की क़ौम (क़ुरैश) इस से बर्गशता होती और मुख़ालिफ़त करती है और क़ुरआन को जो ख़ुदा की तरफ़ से आया है रद्द करती है तो उस के दिल में ये ख़्वाहिश पैदा हुई कि ख़ुदा की तरफ़ से कोई ऐसे  अल्फ़ाज़ नाज़िल हों जिनके वसीले से इस की क़ौम के लोग इस से सुलह कर लें और उस की ये ख़्वाहिश बढ़ती गई कि वोह ईमान लावें। और एक दिन ऐसा हुआ कि वो क़ुरैश की मजलिस में था और इसी वक़्त ख़ुदा ने सूरह अल-नजम नाज़िल फ़रमाई । और रसूल ने इस को पढ़ा और जब इन  अल्फ़ाज़ पर पहुंचा :—

और क्या तुम देखते हो लात व उज्जा और मनात तो शैतान ने इस की दिली-ख़्वाहिश उस के लबों पर रख दी ये बुज़ुर्ग देवियाँ हैं और यक़ीनन उन से शफ़ाअत की उम्मीद की जा सकती हैI अहले क़ुरैश ये सुनकर बहुत ख़ुश हो गए।

यही हिकायत मुवाहिब अललदीना में यूं मुंदर्ज है :—

قرا رسول اللہ صلعمہ بمکتہ والنجم فلما بلغ افرایتم الات والغریٰ ومنات الثالثتہ  الاخری القی الشیطان علی لسانہ تلک الغرانیق العلیٰ وان شاعھتم لترتجی فقال المشرکون ماذکر الھتنا بخیر قبل الیوم فسجد وسجد وافنزلت ھذہ الایہ وما ارسلنا من قبلک من رسول ولا نبی الاذاتمنی القیٰ الشیطان فی امنیتہ

रसूलअल्लाह सलअम मक्का में सूरह अल-नजम पढ़ रहे थे और जब पहुंचे “क्या देखते हो तुम लात व उज्जा और मनात तीसरे को” तो शैतान ने ये  अल्फ़ाज़ उन के लबों पर रख दीए कि "ये बुज़ुर्ग देवियाँ हैं और उन से शफ़ाअत की उम्मीद की जा सकती है।“ और बुत परस्तों ने कहा “आज उसने हमारी देवियों के हक़ में ख़ूब कहा है।“ पस उसने सज्दा किया और उन्होंने भी सज्दा किया। फिर यह आयत नाज़िल हुई "हमने कोई रसूल या-नबी ऐसा नहीं भेजा जिसके पढ़ने में शैतान ने कोई ग़लती ना मिला दी हो।“

मुंदरजा-बाला ग़लती का इस कदर जल्दी एतराफ़ करके इस से तौबा करना आँहज़रत के हक़ में बहुत अच्छा है और बाद में आपने हमेशा हर सूरतों में बुत-परस्ती की तर्दीद की लेकिन इस से आपको बहुत ही कम फ़ायदा पहुंचा क्योंकि हम देखते हैं कि फिर भी आप अपनी मतलब-बरारी के लिए बेताम्मुल अपने अक़्वाल को बदलते रहे। चुनांचे जब आँहज़रत मदीना में हिज्रत फ़र्मा हुए तो बिल्कुल बे-यार व ग़मख़वार और बेकसी की हालत में थे। इन अय्याम में मदीना में बहुत से बाक़दरत यहूदी आबाद थे। आपने उन से दोस्ती व रसुख़ की ज़रूरत को फ़ौरन महसूस किया और इस से ग़रज़ से यरूशलेम को अपना क़िब्ला मुक़र्रर किया और मुद्दत मदीद तक इस शहर की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ते रहे लेकिन आख़िर-ए-कार जब यहूदीयों को अपना तरफ़दार बनाने में किसी तरह से कामयाबी नसीब ना हुई और आप की जमईयत बढ़ गई तो आप ने क़ौम क़ुरैश को हासिल करने की एक मर्तबा फिर कोशिश की और इस मक़सद के लिए वही आस्मानी का एक और पैग़ाम पेश किया जिसकी रु से फिर काअबा ही क़िब्ला मुक़र्रर किया गया । चुनांचे सूरह अलबक़र में यूं मुंदर्ज है :—

وَمَا جَعَلْنَا الْقِبْلَةَ الَّتِىْ كُنْتَ عَلَيْهَآ اِلَّا لِنَعْلَمَ مَنْ يَّتَّبِـــعُ الرَّسُوْلَ مِمَّنْ يَّنْقَلِبُ عَلٰي عَقِبَيْهِ ۭ وَاِنْ كَانَتْ لَكَبِيْرَةً اِلَّا عَلَي الَّذِيْنَ ھَدَى اللّٰهُ ۭ وَمَا كَانَ اللّٰهُ لِـيُضِيْعَ اِيْمَانَكُمْ ۭ اِنَّ اللّٰهَ بِالنَّاسِ لَرَءُوْفٌ رَّحِيْمٌ    ١٤٣ قَدْ نَرٰى تَـقَلُّبَ وَجْهِكَ فِي السَّمَاۗءِ ۚ فَلَنُوَلِّيَنَّكَ قِبْلَةً تَرْضٰىھَا ۠فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ ۭوَحَيْثُ مَا كُنْتُمْ فَوَلُّوْا وُجُوْھَكُمْ شَطْرَهٗ

और वह क़िब्ला जिस पर तू था हमने इस लिए ठहराया था कि मालूम करें कौन रसूल की पैरवी करता है और कौन उल्टे पांव फिर जाता है और यह बात मुश्किल थी सब पर सिवाए उनके जिनको अल्लाह ने हिदायत दी और अल्लाह ऐसा नहीं कि तुम्हारा यक़ीन लाना ज़ाए कर दे। अलबत्ता अल्लाह लोगों पर शफ़ीक़ व महरबान है । हम देखते हैं कि तेरे मुँह का फिरना आस्मान की तरफ़ सो अलबत्ता हम फेरेंगे तुझको जिस क़िब्ला की तरफ़ तू राज़ी है। अब फेर ले अपना मुँह मस्जिद-उल-हराम की तरफ़ और जिस जगह तुम हो उसी की तरफ़ अपना मुँह फेरा करो I

अब्दुल क़ादिर का बयान है कि आँहज़रत फिर मक्का को क़िब्ला बनाना चाहते थे। चुनांचे वो लिखता है "चाहते थे कि काअबा की तरफ़ नमाज़ पढ़ो" । ऐसी हालत में कुछ ताज्जुब नहीं कि आँहज़रत ने अपनी ख़्वाहिश के मुताबिक़ तब्दीली कर ली और फिर उस तब्दीली की ताईद व तस्दीक़ में वही आस्मानी पेश कर दिया ।

आँहज़रत ने अपनी मदनी रिहाईश के अय्याम में एक जाबिराना हुक्म यहूदी रोज़ों के बारे में दिया था लेकिन बाद में क़िब्ला की मानिंद ये भी तब्दील हो गया। मौजूदा हाल की हाजात को देख कर आप हसब-ए-ख़्वाहिश अपनी मतलब-बरारी के लिए क़वानीन वज़ाअ कर लेते थे और फिर आप ही उन को मंसूख़ भी कर दिया करते थे । लेकिन तरफ़ा ये है कि इस किस्म की तमाम कार्यवाईयों पर वही आस्मानी की मुहर होती थी। काज़िम लिखता है :—

راوی ان رسول اللہ لما قدم المدینہ وجد یھودیا یصومون عاشورا فسا لھمہ عن ذلک فقا الوانہ الذی غرق فیہ فرعون وقومہ ونجی موسیٰ ومن معہ فقال انا الحق موسیٰ منھمہ فا مرصبوم عاشور

रिवायत की गई है कि जब आँहज़रत मदीना पहुंचे और देखा कि यहूदी आशूरा का रोज़ा रखते हैं तो उन से इस का सबब दर्याफ़्त किया। उन्हों ने जवाब दिया कि इस दिन पर फ़िरऔन अपनी क़ौम समेत ग़र्क़ हुआ था और मूसा को उस के हम-राहियों समेत नजात मिली थी। इस पर आँहज़रत ने फ़रमाया कि मेरा मूसा के साथ उन से ज़्यादा क़रीबी रिश्ता है और आशूरा के रोज़े का हुक्म सादीर फ़रमाया I

ये रोज़ा जो अब भी दसवीं मुहर्रम-उल-हराम को आला दर्जा का नेक काम ख़्याल करके रखा जाता है इस अम्र का निहायत साफ़ और सरीह सबूत है कि आँहज़रत दीगर मज़ाहिब की रसूम को इख़्तियार कर लेते थे और इसी हक़ीक़त से आपका ये दावा भी बिल्कुल बातिल ठहरता है कि ये सब कुछ बराह-ए-रास्त वही आस्मानी की मार्फ़त आपको पहुंचता था।

एक और बड़ी मशहूर हिकायत है जो क़ुरआन को इन्सानी तस्नीफ़ साबित करती है और ये हिकायत बहुत से बड़े-बड़े मशहूर मुसलमान मुफ़स्सिरीन के बयान के मुताबिक़ आँहज़रत के अपने मुतबन्ना बेटे जै़द की मतलूक़ा बीवी ज़ैनब से शादी रचाने का क़िस्सा है। जै़द आँहज़रत का बेटा मशहूर था और इस ने एक निहायत हसीन औरत ज़ैनब नामी से निकाह किया था। एक रोज़ आँहज़रत जै़द के घर तशरीफ़ फ़र्मा हुए और ज़ैनब को ऐसे लिबास में पाया जिससे उस का हुस्न व जमाल महरनीम रोज़ की तरह बे-हिजाब चमक रहा था। आँहज़रत देखते ही घायल हो गए और फ़रमाया:—

سبحان اللہ مقلب القلوب

"सुब्हान-अल्लाह मुक़ल्लिब-उल-कुलूब" (ख़ुदा-ए-पाक दिलों का फेरने वाला है) ज़ैनब ने ये  अल्फ़ाज़ सुन लिए और फ़ौरन अपने शौहर को इस माजरे से आगाह किया। जै़द ने ज़ैनब को तलाक़ दे दी और आँहज़रत से कहा कि आप इस से निकाह कर लें लेकिन आपने अपने मुतबन्ना बेटे की मतलूक़ा बीवी से निकाह करने में कुछ पसोपेश किया और फिर लोगों की लॉन तान से बचने के लिए आपने वही आस्मानी का फ़तवा सुना दिया और फ़ौरन ज़ैनब से निकाह कर लिया 5 । इस इश्क़ ख़ाना-ख़राब ने तेरी कैसी मिट्टी ख़राब की। चुनांचे वही आस्मानी का ये अजीबो-गरीब फ़तवा सूरह अल-अहज़ाब की 37 वीं और 38 वीं आयात में यूं मुंदर्ज है :—

فَلَمَّا قَضَى زَيْدٌ مِّنْهَا وَطَرًا زَوَّجْنَاكَهَا لِكَيْ لا يَكُونَ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ حَرَجٌ فِي أَزْوَاجِ أَدْعِيَائِهِمْ

फिर जब जै़द तमाम कर चुका इस औरत से अपनी ग़रज़ हमने वो तेरे निकाह में दी ता ना रहे मुसलमानों को गुनाह निकाह कर लेना अपने ले-पालकों की जौरूओं से I

क्या कोई ज़ी-होश और साहिब फ़हम मुसलमान ये ईमान रख सकता है कि मुंदरजा-बाला दो आयतें जो हम ने ज़ैनब के क़िस्से के बारे में क़ुरआन से नकल की हैं कलाम-ए-ख़ुदा हैं? क्या ये ख़ुद ही अयाँ नहीं कि ये दोनों आयतें बजाय वही आस्मानी होने के ख़ुद हज़रत मुहम्मद की घड़नत हैं जिसके आँहज़रत अपने आशिक़ाना जुर्म को छिपाने की ग़रज़ से मुर्तक़िब हुए ।

वही आस्मानी का एक और फ़तवा जो हज़रत मुहम्मद ने अपने ख़ानगी मुआमलात के तब्दीलात की ताईद व तस्दीक़ के बाब में पेश किया सूरह अल-तहरीम की पहली दो आयतों में पाया जाता है। इस फ़तवे की रु से आप को अपनी क़समें तोड़ने की इजाज़त दी गई है। मुफ़स्सिरीन इस क़िस्से को यूं बयान करते हैं कि :—

आँहज़रत अपनी एक लौंडी मर्यम नामी की बहुत क़दर करते थे और आप इस पर ऐसे फ़रेफ़्ता वलदादा हुए कि आपकी दीगर बहुत सी ज़ोजात हसद व रश्क़ से भर गईं और निहायत सख़्ती से सरज़निश करने लगीं इस पर आँहज़रत ने क़समिया वाअदा किया कि अब से मर्यम से कुछ सरोकार नहीं रखूंगा लेकिन कहना आसान और करना हमेशा मुश्किल है। आपने अपने नफ़सानी ग़लबात का मग़्लूब हो कर फिर रुजू कर लिया और सब क़समें काफ़ूर हो गईं और आप की इस कार्रवाई के जवाज़ पर आपका फ़रमांबर्दार वही आस्मानी फ़ौरन ये पैग़ाम लाया :—

يٰٓاَيُّهَا النَّبِيُّ لِمَ تُحَرِّمُ مَآ اَحَلَّ اللّٰهُ لَكَ ۚ تَبْتَغِيْ مَرْضَاتَ اَزْوَاجِكَ   ۭ وَاللّٰهُ غَفُوْرٌ رَّحِيْ قَدْ فَرَضَ اللّٰهُ لَكُمْ تَحِلَّةَ اَيْمَانِكُمْ

"ए नबी तो क्यों हराम करता है जो हलाल किया अल्लाह ने तुझ पर ? तो अपनी औरतों की रजामंदी चाहता है और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है ठहरा दिया अल्लाह ने तुमको उतार डालना तुम्हारी किस्मों का I

इन आयात की मज़ीद तफ़्सीर व तहक़ीक़ के बाब में हम कुछ नहीं कहेंगे । ज़ी-होश मुसलमानों से दरख़्वास्त है कि इन आयतों पर ख़ूब सोचें । क्या क़ुरआन के ये  अल्फ़ाज़ अज़ल ही से अर्श ईलाही के पास लौह-ए-महफ़ूज़ पर मर्क़ूम थे? इस क़िस्सा के मुताल्लिक़ मुस्लिम की एक हदीस काबिल-ए-ग़ौर है। इस से आँहज़रत के ख़ानगी मुआमलात व क़वानीन पर कुछ रोशनी पड़ती है। चुनांचे मिश्कात अल-मसाबिह बाब अल-अशारात-उन्निसा में यूं मर्क़ूम है :—

عائشہ قالت کنت اغار علی اللتی ووھبن  انفسھمن لرسول اللہ صلعمہ ۔ فقلت اتھب المراتہ نفسہا فلما انزل اللہ تعالیٰ ترجی 6 من تشاء منھمن وتووی الیک من تشاء من ابتغیت ممن عزلت فلا جناح علیک قلت مااری ربک الایسارع فی ھوالک متفق علیہ

आईशा ने कहा मैं इन औरतों की बाबत सोच रही थी जिन्हों ने अपने तेईं रसूल को दे दिया। पस बेटे ने कहा ये क्या बात है कि औरत अपने तेईं रसूल को दे दे और ख़ुदा ये पैग़ाम भेजे कि अपनी मौजूदा बीवीयों में से तू जिसे चाहे तर्क कर और तर्क कर्दा शूदा में से जिसे चाहे फिर अपनी हमख़वाबा बना ले इस में तेरे लिए कोई गुनाह नहीं है। मैंने कहा में तो सिवाए उसके और कुछ नहीं देखती कि तेरा ख़ुदा तेरी ख़्वाहिशें पूरी करने में जल्दी करता है।

जिहाद के बाब में भी क़ुरआन में बहुत से मुतज़ाद वि मतनाक़ीज़ अहकाम पाए जाते हैं जिनसे साबित होता है कि आँहज़रत हमेशा हसब-ए-मौक़ा व  ज़रूरत जैसा इल्हाम चाहते थे घड़ लेते थे। अगर क़ुरआन की तवारीख़ी हक़ीक़तों को मद्द-ए-नज़र रखकर उस का मुताअला किया जाये तो ख़ूब अयाँ हो जाएगा कि इब्तदाए इस्लाम में जब आप बेकस व लाचार और मज़लूम थे तो आप की तालीम अपने मोमिनीन को यह थी कि जो मुसलमान नहीं हैं इन से नरमी और बरुदबारी के साथ बरताव किया जाये। चुनांचे सूरह बक़रा में मर्क़ूम है :—

لَآ اِكْرَاهَ فِي الدِّيْنِ

तर्जुमा: दीन में कोई ज़बरदस्ती नहीं है

लेकिन जब आँहज़रत के दिन फिरे और बहुत से जंगजू और लूट मार के मुश्ताक़ अरब आपके झंडे तले जमा हो गए तो वही आस्मानी में भी अजीब तबदीली वाक़ेअ हुई और जिब्राईल ने ब-आवाज़-ए-बुलंद पुकार कह दिया 7:—

قٰتِلُوْھُمْ حَتّٰى لَا تَكُوْنَ فِتْنَةٌ وَّيَكُوْنَ الدِّيْنُ لِلّٰهِ

तर्जुमा" काफ़िरों को क़तल करो हत्ता कि फ़ित्ना बाक़ी ना रहे और दीन ख़ुदा क़ायम हो जावे I

फिर जो सूरह सबसे पीछे नाज़िल हुई उस के  अल्फ़ाज़ अज़बस सख़्ती और तशद्दुद से पुर हैं और किसी तरह से सुलह व नेक सुलूक की गुंजाइश बाक़ी नहीं रही। चुनांचे यूं मर्क़ूम है 8:—

يٰٓاَيُّھَا النَّبِيُّ جَاهِدِ الْكُفَّارَ وَالْمُنٰفِقِيْنَ وَاغْلُظْ عَلَيْهِمْ ۭ وَمَاْوٰىهُمْ جَهَنَّمُ

तर्जुमा: ए नबी तू काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों के साथ जिहाद कर और उन पर सख़्ती कर क्योंकि उनका मस्कन जहन्नुम है I

फिर इस सूरह की पांचवीं आयत भी काबिल-ए-ग़ौर है :—

فَاقْتُلُوا الْمُشْرِكِيْنَ حَيْثُ وَجَدْتُّمُــوْهُمْ وَخُذُوْهُمْ وَاحْصُرُوْهُمْ وَاقْعُدُوْا لَهُمْ كُلَّ مَرْصَدٍ

तर्जुमा : “मुशरिकों को क़त्ल करो जहां कहीं उन्हें पाओ और उन को पकड़ो और क़ैद करो और तमाम घात की जगहों में इन की घात में बैठो ।“

हज़रत मुहम्मद ने बसा-औक़ात क़ुरआन के तर्ज़ बयान और फ़साहत ओ बलाग़त को मिनजानिब अल्लाह होने की दलील और सबूत के तौर पर पेश किया लेकिन जब कभी कोई बरजस्ता फ़िक़रा आँहज़रत के कान तक पहुंचता था तो फ़ौरन उसे दाख़िल क़ुरआन कर लेते थे ताकि क़ुरआनी फ़साहत की क़द्रो-क़ीमत बढ़ जाये। इस किस्म के इंदिराज और सिरकों की बहुत सी मिसालें अरबी इल्म-ए-अदब से बहम पहुँचती हैं। चुनांचे बैज़ावी का बयान है कि :—

عبداللہ بن سعد ابن ابی سرج کان کاتب الرسول اللہ فلما نزلت ولقد خلقنا الانسان من سلالتہ من طین ولما بلغ قولہ ثمہ انشانا خلقنا اخرقال عبداللہ فتبار ک اللہ احسن الخالقین تعجبا من تفصیل خلق الانسان فقال علیہ السلام اکتبھا فکذلک نزلت فشک عبداللہ وقال لئن کان محمد صادقا لقدا وحی الی کما اوحی الیہ ولئن کان کاذبالقدوقلت کماقال

तर्जुमा" अब्दुल्लाह बिन साद बिन अबी सरह आँहज़रत का कातिब था। जब ये अल्फ़ाज़ नाज़िल हुए कि हमने इन्सान को सलाला ख़ाक से पैदा किया और जब ये अल्फ़ाज़ ख़त्म हुए और यह अल्फ़ाज़ आए कि हमने फिर उस को एक और मख़्लूक़ बनाया। इस पर अब्दुल्लाह जोश में आकर बोल उठा कि :—

اللہ احسن الخالقین

अल्लाह अहसन-उल-ख़ालीक़ीन मुबारक हो। इस ने इन्सान को अजीब तौर से पैदा किया है। इस पर आँहज़रत ने फ़रमाया कि ये भी लिख लो क्योंकि ऐसा ही नाज़िल हुआ है लेकिन अब्दुल्लाह ने शक किया और कहा कि अगर मुहम्मद सच्च कहता है तो मुझ पर भी वही का नुज़ूल हुआ है जैसा कि इस पर लेकिन अगर वह झूट बोलता है तो मैं ने वही बात कही है जो उस ने कही ।

बैज़ावी के इस बयान से अज़हर-मिन-श्शम्स है कि हज़रत मुहम्मद को अब्दुल्लाह का ये फ़िक़रा ऐसा पसंद आया कि फ़ौरन क़ुरआन में दर्ज करने का हुक्म दे दिया और फ़रमाया कि ऐसा ही नाज़िल हुआ है। अब्दुल्लाह इस से बहुत ख़ुश हुआ और अक्सर फ़ख़रियाह ये कहा करता था कि ख़ुदा मेरे पास भी वही भेजता है लेकिन आँहज़रत इस से बहुत नाख़ुश हुए और वही आस्मानी की ज़बानी अब्दुल्लाह पर अपने ग़ज़ब का यूं इज़हार किया 9:—

وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَى عَلَى اللَّهِ كَذِبًا أَوْ قَالَ أُوحِيَ إِلَيَّ وَلَمْ يُوحَ إِلَيْهِ شَيْءٌ

तर्जुमा: इस से बढ़कर ज़ालिम कौन है जिसने अल्लाह पर इफ़्तरा बाँधा या कहा कि ख़ुदा ने मेरी तरफ़ वही को भेजा दर-हालीका उस की तरफ़ वही को नहीं भेजा । (सूरह इनाम आयत 93)

ये हिकायत इमाम हुसैन ने भी बयान किया है और इस से साफ़ ज़ाहिर होता है कि क़ुरआन का तर्ज़ बयान या उस की फ़साहत ओ बलाग़त कोई मोजिज़ा नहीं क्योंकि अब्दुल्लाह बिन साद का कलाम भी क़ुरआन का हम-पाया मान कर क़ुरआन में दर्ज किया गया और किसी तरह से वो फ़साहत के लिहाज़ से कम दर्जा का नहीं समझा जाता। इलावा-बरीं जब आँहज़रत ने अपने एक पैरौ के कलाम को सुन कर पसंद फ़रमाया और क़ुरआन में दर्ज क़राने के लिए कह दिया कि वही आस्मानी यूंही है तो कुछ ताज्जुब नहीं बल्कि क़रीन-ए-क़ियास है जो कि हिकायत व अफ़्साने आपने वक़तन-फ़-वक़तन यहूदीयों और ईसाईयों से सुने उन को वही आस्मानी के नाम से दाख़िल क़ुरआन कर लिया।
मशहूर मुसलमान मुफ़स्सिर जलाल उद्दीन-अल-सीवती लिखता है कि आँहज़रत अपने पैरौओं के वो अल्फ़ाज़ व फ़क़रात जो आप को पसंद आते क़ुरआन में दर्ज कर लिया करते थे। चुनांचे इत्तिक़ान में यूं मर्क़ूम है :—

النوع العاشر فیما نزل من القرآن علیٰ لسان بعض  الصحابتہ

दसवीं क़िस्म वो है जिसमें क़ुरआन के वो हिस्से मुंदर्ज हैं जो आँहज़रत के बाअज़ अस्हाब की ज़बान पर नाज़िल हुए ।

एक और हदीस तिर्मिज़ी  ने इब्न उमर की रिवायत से लिखी है कि :—

رسول اللہ صلمہ قال ان اللہ جعل الحق علی لسان عمروقبلہ

रसूल सलअम ने फ़रमाया कि अल्लाह ने यक़ीनन सच्चाई को उमर के दिल व ज़बान पर रखा है।

आँहज़रत इस क़दर उमर के  अल्फ़ाज़ को इस्तिमाल किया करते थे कि आपके अस्हाब कहने लगे

نزل القرآن علے نحو ماقال عمر

क्या क़ुरआन ऐसा ही नाज़िल नहीं हुआ जैसा कि उमर बोलता है।

 मुजाहिद लिखता है :—

کان عمر یری الریٰ نزل بہ القرآن

क़ुरआन उमर की राय के मुताबिक़ नाज़िल होता था I

इन अहादीस से साफ़ ज़ाहिर होता है कि क़राअ के बाअज़ हिस्सों का हक़ीक़ी मुसन्निफ़ उमर ही था। कुतुब इस्लाम में इस किस्म के बयानात बकसरत मिलते हैं चुनांचे क़ुरआन में लिखा है 10 :—

مَن كَانَ عَدُوًّا لِّلَّهِ وَمَلائِكَتِهِ وَرُسُلِهِ وَجِبْرِيلَ وَمِيكَالَ فَإِنَّ اللَّهَ عَدُوٌّ لِّلْكَافِرِينَ

तर्जुमा: जो कोई जिब्राईल या मीकाईल का दुश्मन है....यक़ीनन ख़ुदा काफ़िरों का दुश्मन है I

ये अल्फ़ाज़ पहले उमर ने किसी यहूदी से हमकलाम होते वक़्त इस्तिमाल किए थे लेकिन आँहज़रत को ऐसे पसंद आए कि आपने फ़ौरन उन्हें क़ुरआन का एक जुज़ु बयान फ़रमाया। ये तमाम क़िस्सा बैज़ावी ने यूं लिखा है :—

قیل دخل عمر رضی اللہ عنہ مدارس الیھود مافسا لھمہ عن جبریل فقالوذالک عدونا یطلع محمد علیٰ اسرارنا وانہ صاحب کل خسف وعذاب  ومیکائیل صاحب الخصب والسلام فقال ومامنز لتھما عن اللہ تعالیٰ قالو ا جبرایل عن یمینہ ومیکائل عن یسارہ وبینہا عداوتہ فقال لئن کان کماتقولون فیلسا بعدوین ولا نتم اکفرمن الحمیر ومن کان عدو ااحد ھما ھوعدواللہ تعالی ثمہ رجع عمر فوجد جبریل قد سبقتہ بالوحی فقال علیہ السلام لقدووافقک ربک یا عمر

कहते हैं कि एक बार उमर यहूदी मदरसे में गया और उन से जिब्रील की बाबत पूछा। उन्हों ने कहा वो हमारा दुश्मन है। वो हमारे भेद मुहम्मद को बताता है। नीज़ वो ग़ज़ब और अज़ाब का क़ासिद है। बख़िलाफ़ उस के मीकाईल आसूदगी और मुरफ़्फ़ा हाली का फ़रिश्ता है। तब उमर ने पूछा कि ख़ुदा के हुज़ूर में उनका क्या रुत्बा है? यहूदीयों ने जवाब दिया कि जिब्राईल ख़ुदा के दाएं तरफ़ और मीकाईल बाएं तरफ़ रहता है और उन दोनों में दुश्मनी है। लेकिन उम्र ने कहा ख़ुदा ना करे कि तुम्हारा कहना सच्च हो। वो दुश्मन नहीं हैं लेकिन तुम बनी हमीर से भी बढ़ कर काफ़िर हो। जो कोई इन दोनों फ़रिश्तों में से किसी का दुश्मन है वो ख़ुदा का दुश्मन है। तब उमर वहां से लौटा और देखा कि जिब्राइल इस से पहले पैग़ाम ला चूका है और आँहज़रत ने फ़रमाया ए उमर तेरे रब ने तुझसे इत्तिफ़ाक़ किया है।

एक और सही हदीस बुख़ारी से मिलती है जिससे क़ुरआन के और तीन मुक़ामात का पता मिलता है और उनकी असलीयत मालूम होती है। इस हदीस से ये बात बख़ूबी तमाम पाया सबूत को पहुँचती है कि हज़रत मुहम्मद ने ज़्यादा-तर अपने अस्हाब के अक़्वाल क़ुरआन में दर्ज किया है। अगर इन अहादीस का माक़ूल तौर से ठीक मतलब निकाला जाये तो वही आस्मानी की मार्फ़त क़ुरआन के नाज़िल होने का दावा बिल्कुल बातिल ठहरता है और जैसा कि इस किताबचा के शुरू में कहा गया ये बात साबित होती है कि क़ुरआन आँहज़रत की अपनी तबईयत के नताइज का मजमूआ है। बुख़ारी की मज़कूरा बाला हदीस में यूं दर्ज है :—

اخرج البخاری وغیرہ عن النحس قال عمر ابن خطاب ۔۔۔۔۔ ربی فی ثلاث قلت یارسول اللہ لواتخذ فامن مقام ابراہیم مصلی فنزلت  واتخذ وامن مقام ابراہیم مصلے وقلت یا رسول اللہ ان نسائک یدخل علیھن البروالفا جرفان مرتھن بجتجین  فنزلت ایتہ الحجاب  واجتمع علے رسول اللہ نساوہ فی الغیرتہ فقلت لھن عسیٰ ربہ طلقکن ان یبدلہ ازواجاخیر منکن فنزلت کذالک

बुख़ारी और बाअज़ औरों ने लिखा है कि उमर इब्न ख़त्ताब ने कहा तीन बातों में मैंने ख़ुदा से (यानी क़ुरआन से) इत्तिफ़ाक़ किया। अव्वल ये कि मैंने कहा ए रसूल अल्लाह अगर हम मुक़ाम इब्राहिम पर अपनी नमाज़ें अदा किया करते तो बेहतर होता। ख़ुदा ने नाज़िल फ़रमाया कि मुक़ाम इब्राहिम पर नमाज़ अदा करो। दोम मैंने कहा या रसूलअल्लाह अच्छे बुरे हर तरह के लोग आपके घर पर आते हैं अगर आप अपनी ज़ोजात को पर्दे में रखें तो बेहतर होगा। इस पर ख़ुदा ने आयता अल-अहजाब नाज़िल फ़र्मा दी। सोम जब आँहज़रत की ज़ोजात झगड़ती थीं तो मैं ने इन से कहा कि मुम्किन है कि ख़ुदा तुम को तलाक़ दिलवा दे और रसूल को तुम्हारे इव्ज़ मैं तुमसे बेहतर बीवीयां दे और तब बिल्कुल जैसा मैंने कहा था वैसा ही ख़ुदा की तरफ़ से वही पैग़ाम लाया।

चुनांचे ये तीनों आयात जिनका उमर ने ज़िक्र किया सूरह अल-बक़रा और सूरह अल-तहरीम में मौजूद हैं।

क़ुरआन के और बहुत से मुक़ामात पेश किए जा सकते हैं। जो आँहज़रत ने अपने अस्हाब से सुनकर दाख़िल क़ुरआन कर लिए लेकिन इस किताबचा में ज़्यादा की गुंजाइश नहीं। अगर कोई इस अम्र की मज़ीद तहक़ीक़ात का मुश्ताक़ हो तो डाक्टर इमाद-उद्दीन की किताब मुसम्मा बह हिदायत अल-मुस्लिमीन को पढ़हे जिसमें ये अम्र निहायत शरह व बसत के साथ मुफ़स्सिल मुंदर्ज है। ताहम हमने इस अम्र को बख़ूबी ज़ाहिर कर दिया है कि क़ुरआन को वही आस्मानी और जिब्राइली पैग़ामों का मजमूआ मानने का अक़ीदा बिल्कुल बातिल व बे-बुनियाद है। मुम्किन है कि आँहज़रत ने अपने इब्तदाए हाल में और ख़ुसूसन जब आपने तौहीद बारी की हक़ीक़त को महसूस किया ग़लती से ये ख़्याल कर लिया हो कि मेरे ख़्यालात ईलाही इल्हाम पर मबनी हैं लेकिन इस में बिल्कुल कलाम नहीं और क़ुरआन ख़ुद शाहिद है कि बाद में आपने दीदा व दानिस्ता अपने ज़मीर की आँखों पर पट्टी बांध कर बहुत से इल्हाम ख़ुद घड़ लिए और अपनी मतलब-बरारी की ग़रज़ से इस इख़्तिरा व इफ़्तरा का नाम वही आस्मानी रखा।

क़ुरआन की बहुत सी इबारात का वजूद तो उस वक़्त के दीगर मज़ाहिब के इन अक़ाइद व रसूम से है जिन तक आपकी रसाई हुई और आप के आस-पास के बुत परस्तों की बहुत सी बातें भी जिन को आप हसब मक़सद रद्दो-बदल करके कलाम में ला सके दाख़िल क़ुरआन कर ली गईं लेकिन आप बड़े दावे से यही कहे चले जाते हैं कि क़ुरआन का लफ़्ज़ और हर्फ़-हर्फ़ जिब्राईल आस्मान पर से लाया है और क़ुरआन पहली किताबों का मुसद्दिक़ है।

चुनांचे सूरह माइदा की 52 वीं आयत में मर्क़ूम है :—

مُصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ مِنَ الْكِتَابِ

तर्जुमा: तस्दीक़ करता हूँ पहली किताबों की।

यहूदीयों और ईसाईयों की किताबों की बाबत जैसा ख़ुद हज़रत ने तस्लीम किया सूरह अल-अनआम की एक 155 आयत में मुंदर्ज है :—

تَمَامًا عَلَى الَّذِيَ أَحْسَنَ وَتَفْصِيلاً لِّكُلِّ شَيْءٍ وَهُدًى وَرَحْمَةً

तर्जुमा: तमाम अच्छी बातों के लिहाज़ से कामिल और तफ़सील हर बात की और हिदायत व रहमत

पस जब यहूदीयों और ईसाईयों की किताबों को आँहज़रत भी ऐसा तस्लीम करते हैं तो हम पूछते हैं कि फिर क़ुरआन की ज़रूरत ही किया थी? अगर कोई बाइबल शरीफ़ को ग़ौर से और तास्सुब की ऐनक उतार कर पढ़े तो मालूम हो जाएगा और किसी तरह का शक व शुबह बाक़ी नहीं रहेगा। कि मसीही दीन की तालीमात उस वक़्त तक के लिए हैं जब मसीह दुबारा आकर जहान का इन्साफ़ करेगा। इंजील की मुनादी का तमाम अक़्वाम तक पहुंचना ज़रूर है और मसीह की बादशाहत वो बादशाहत है जिसका कभी ख़ात्मा नहीं होगा। इंजील शरीफ़ में कफ़्फ़ारा का काम पूरा हो चुका और अब सिर्फ ये मसीहीयों का काम है कि तमाम जहान को उस नजात की ख़ुशख़बरी सुना दें जो मसीह के ख़ून के वसीला से हासिल होती है। पस अब और इल्हाम या क़ुरआन की ना गुंजाइश है और ना ज़रूरत। मसीही ही “अव्वल” 11 व आख़िर” है और "आस्मान 12 के तले आदमीयों को कोई दूसरा नाम नहीं बख़्शा गया जिसके वसीले से हम नजात पा सकें ।“

मुसलमान मुहक़्क़िक़ीन से दरख़ास्त है कि इन हक़ीक़तों पर ग़ौर करें और अगर ऐसा करें तो उन पर ये बात रोज़-ए-रौशन की तरह ज़ाहिर हो जाएगी कि क़ुरआन का वही आस्मानी और ख़ुदा की तरफ़ से होना बिल्कुल नामुम्किन है। अगरचे क़ुरआन में लिखा है कि इंजील पर ईमान लाना ज़रूरी है या यूं कहें कि क़ुरआन हर एक मुसलमान को इंजील पर ईमान लाने का हुक्म देता है तो भी इंजील पर ईमान लाने का नतीजा क़ुरआन का रद्द करना होगा क्योंकि क़ुरआन बहुत से इन्जीली हक़ायक़ का मुन्किर है। हासिल-ए-कलाम मुसलमान अजीब मुश्किल में मुब्तला हैं। उनकी दीनी किताब उनको इस किताब पर ईमान लाने का हुक्म देती है जिससे उन के दीन का पोल बख़ूबी खुल जाता है। इन को हुक्म है कि दो नक़ीज़ों पर ईमान लावें । इन को हुक्म है कि ईसा को नबी क़बूल करें और साथ ही हज़रत मुहम्मद पर भी ईमान लावें । इन को ये भी हुक्म है कि पहली किताबों को कलाम-उल्लाह मानें अगरचे इन किताबों में साफ़ बयान है कि यहूदी तवारीख़ मसीहीयत में आकर कामिल होती है फिर उन को इंजील पर ईमान लाने का हुक्म है अगरचे इंजील से साफ़ मालूम होता है कि इंजील ही आख़िरी इल्हामी कलाम है और मुहम्मद के लिए ये दावा करने का कोई मौक़ा बाक़ी नहीं है कि मैं ख़ातिम-उन-नबिय्यिन हूँ । इस किताबचा के पढ़ने वाले से इल्तिमास है कि इन पहली मुक़द्दस किताबों को ग़ौर से पढ़ें जिनकी हज़रत मुहम्मद ने बहुत तारीफ़ तौसीफ़ की है और उन में हयात की राह मिलेगी I


5. सुरह अहज़ाब आयत 51

6. सुरह अहज़ाब आयत 51

7. सुरह बक़र आयत 184

8. सुरह तौबा आयत 47

9. सुरह अनआम आयत 93

10. सुरह बक़रह आयत 91 और 92

11. इंजील मुक़ाश्फा पहला बाब 17 वी आयत

12. इंजील आमाल 4 बाब 12 वी आयत